विधेयकों की समय-सीमा को लेकर राष्ट्रपति के संदर्भ पर 19 अगस्त से शुरू होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संविधान के अनुच्छेद 200 (विधेयकों पर स्वीकृति) और 201 (विचार के लिए आरक्षित विधेयक) के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों के संबंध में दिए गए राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई शुरू करने के लिए 19 अगस्त की तारीख तय की।

न्यायालय ने केरल और तमिलनाडु राज्यों को संदर्भ की स्वीकार्यता पर अपनी प्रारंभिक आपत्तियां उठाने के लिए पहले एक घंटे का समय देने पर भी सहमति व्यक्त की। इसके बाद न्यायालय 19, 20, 21 और 26 अगस्त को संदर्भ का समर्थन करने वाले अटॉर्नी जनरल और केंद्र सरकार की सुनवाई शुरू करेगा।

संदर्भ का विरोध करने वाले पक्षों की सुनवाई 28, 2, 3 सितंबर और 9 सितंबर को होगी। यदि कोई प्रत्युत्तर होगा, तो उस पर 10 सितंबर को सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की संविधान पीठ ने पक्षकारों से 12 अगस्त तक लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा है। एडवोकेट अमन मेहता और मीशा रोहतगी को क्रमशः केंद्र और संदर्भ का विरोध करने वाले पक्षों की ओर से नोडल वकील नियुक्त किया गया ताकि वे दोनों पक्षों के संकलन तैयार कर सकें।

केरल राज्य की ओर से सीनियर एडवोकेट केके वेणुगोपाल ने न्यायालय को सूचित किया कि उन्होंने आवेदन दायर कर तर्क दिया कि तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में संदर्भ में उठाए गए 14 में से 11 प्रश्नों के उत्तर पहले ही दिए जा चुके हैं और अनुच्छेद 143 का दुरुपयोग करके न्यायालय के निर्णय को दरकिनार करने का प्रयास किया जा रहा है। तमिलनाडु राज्य की ओर से सीनियर एडवोकेट डॉ. एएम सिंघवी और पी. विल्सन ने यह भी प्रस्तुत किया कि तमिलनाडु सरकार ने भी संदर्भ की वैधता को चुनौती देते हुए एक समान आवेदन दायर किया।

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए एक महत्वपूर्ण संदर्भ पर सुनवाई का शेड्यूल तय किया है। राष्ट्रपति ने सवाल उठाया है कि क्या न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति देने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए समय सीमा निर्धारित कर सकता है। इस मामले की सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ करेगी, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई करेंगे। हालांकि तमिलनाडु और केरल राज्य ने राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए सवालों का कड़ा विरोध किया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत यह संदर्भ सुप्रीम कोर्ट को भेजा था, जिसमें 14 सवाल उठाए गए हैं। ये सवाल सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 के उस फैसले से संबंधित हैं, जिसमें कोर्ट ने राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय सीमा निर्धारित की थी और कहा था कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की निष्क्रियता न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है। तमिलनाडु और केरल ने इस संदर्भ की वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे “अपील का छद्म रूप” करार दिया है।

केरल राज्य ने बताया कि न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला द्वारा 8 अप्रैल को लिखे गए तमिलनाडु राज्यपाल मामले के फैसले में मई में राष्ट्रपति के संदर्भ में उठाए गए प्रश्नों पर पहले ही विस्तार से चर्चा की जा चुकी है।

केरल राज्य ने सोमवार (28 जुलाई, 2025) को सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति के संदर्भ को खारिज करने का आग्रह किया, जिसमें यह स्पष्टता मांगी गई थी कि क्या न्यायपालिका राष्ट्रपति और राज्य के राज्यपालों के लिए राज्य विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय सीमा तय कर सकती है, उन्होंने कहा कि यह तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में अपने स्वयं के आधिकारिक घोषणा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को अपील में बैठाने का एक प्रयास है ।

राज्य ने कहा कि संविधान सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही फैसलों के खिलाफ अपील करने की अनुमति नहीं देता, न ही राष्ट्रपति राष्ट्रपति संदर्भ के माध्यम से न्यायालय को अपील का अधिकार दे सकते हैं। केरल ने तर्क दिया कि यह संदर्भ बाध्यकारी संवैधानिक फैसलों को “दबाने” की कोशिश है और इसे अस्वीकार किया जाना चाहिए।

तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि राष्ट्रपति के संदर्भ में उठाए गए सवाल सुप्रीम कोर्ट के तमिलनाडु मामले में दिए गए फैसले में पहले ही स्पष्ट किए जा चुके हैं। राज्य ने कहा कि यह संदर्भ उस फैसले को पलटने की कोशिश है, जो कानूनन अनुचित है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसलों पर अनुच्छेद 143 के तहत पुनर्विचार नहीं कर सकता।

राज्य सरकार का कहना है कि यह राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 के फैसले को “पुनः खोलने” का प्रयास है, जो कि न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। तमिलनाडु ने अपने आवेदन में दलील दी है कि यह संदर्भ, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले “तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल” में तय किए गए मुद्दों को ही दोहराता है और इस तरह यह “अपील के रूप में छिपा प्रयास” है, जिसे संविधान और न्यायिक परंपरा अनुमति नहीं देते।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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